मेरी कृतज्ञता
(18 फेब्रुवारी 2026)
जीवन के तिरपन वर्ष बीत गए,
मन आज स्वयं से प्रश्न करे—
कितना जिया मैं अपने खातिर,
कितना जग के वश में धरे।
जितना जिया अपने लिए,
सेहत उसका लेखा दे;
जितना जिया औरों के हेतु,
उनकी आँखें स्नेह कहे।
किस-किस ने अपने पल देकर
मेरे पथ को 'राह' बनाई,
कितनों ने सपनों को सींचा,
कितनों ने कीमत चुकाई।
कुछ जीवन मुझमें समाए,
कुछ मुझ पर अर्पित हो गए;
मैं चलता रहा सफलता की ओर,
वे चुपचाप कहीं खो गए।
जिनसे पाया, दे न सका कुछ
उन सबसे मैं क्षमा वरूँ;
लेकर ऋण अनगिन आशीषों का
कैसे उसका हिसाब भरूँ?
जिसने चलना सिखलाया,
जिसने रोककर सोच दिया;
जिसने परिवर्तन में साथ दिया,
कुछ करने का अवसर दिया।
मातपिता की ममता से लेकर
गुरुओं का वह ज्ञान प्रकाश;
नाना-नानी, दादी-दादा,
मित्रों का अनुपम विश्वास।
जिन हाथों ने जीवन तराशा,
जिन आँखों ने मुझे संवारा
उन सबका मैं ऋणी सदा हूँ,
उनसे ही मेरा जग सारा।
आकाश, मिट्टी, बादल, वर्षा,
पेड़, नदी, वन-फूल सुहाने;
पशु-पक्षी, कीट और जीवाणु
सब जीवन के सच्चे ठिकाने।
वे कुछ भी माँगेंगे नहीं...
फिर भी मन 'अर्पण' चाहता;
स्मृतियों में उनको रखकर
हर क्षण "धन्यवाद" कहता।
जिन्होंने की दीर्घायु की कामना,
संदेश, स्नेहिल बात कही;
फोन, पत्र या माध्यम कोई—
कृपा उनकी अमिट रही।
मेरा कोई निजी स्वप्न नहीं,
न कोई अलग योजना है;
देश, धर्म और धरती खातिर
हम सबकी एक 'साधना' है।
जो स्वप्न मिलकर हमने देखे,
वे यथार्थ का रूप धरें;
जब तक लक्ष्य सिद्ध न हो,
हम सब संग-संग आगे बढ़ें।
बस इतनी मेरी अभिलाषा—
साथ रहे यह कारवाँ ;
जीवन हो 'समर्पण' की गाथा,
बने पहचान मेरी 'कृतज्ञता'।
- डॉ मनोज पाटील
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