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एक उपक्रम के निमित्त से..।

एक उपक्रम के निमित्त से..। ------------------------------------ एक उपक्रम के निमित्त से सब चले थे एक दिशा में जीत पक्की और आसान हो इसलिए संगठन के प्रयास चले थे। दो कदम हम चले थे फासले कुछ कम हुए थे आप तन के वहीं खड़े थे तब हम सोचने लगे थे।  सोचते सोचते वक्त निकल गया  बोलते बोलते शब्द फिसल गया  ना हमने माफ किया  ना आपने माफ किया  ना आप एक भी कदम चले  तब हम भी रुक गए।  रिश्ते बनते बनते रह गए ।  रिश्ते बनते बनते रह गए ।  ऐसी बात नहीं की  सब कुछ व्यर्थ गया।  कुछ हम सीख गए  कुछ आप साध गए।  कुछ फूल खिल गए  कुछ फल मिल गए  पत्ते झड़ गए तो क्या  वह भी खाद बन गए।  कुछ टहेनियां बची है  कुछ चुभती रही ,कुछ जल गई है।  कुछ एक जुड़ गए हैं  जिंदगी भर के लिए।