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आना बारिश

आना बारिश ,आना बारिश, जल्दी आना तू  बिन तेरे सूखी पत्ती ,झुकी डाली, खोयी खुशबू ।।धृ।। मन का आंगन, हुआ सुना, ना देखे कोई सपना । जाने कैसे होगा, दिन कल का, डरने लगी रैना ।। दिखे ना बादल, कोई भी नभ में ,व्याकूल है नैना। नैनों से भी ,सूखा पानी ,कोई देख न पाये रोना ।। पंछी पूछे , सूखे डालो से , "कहां है फसलें?" फसलों की ,देख दशा, गांवसे भाग रही नस्लें ।। आओ बाबू, खोया शहर में तू ,है गांव तेरा सुना । ज्ञान धन तु, लेकर आना, फिर उपजाओ सोना ।। (26/6/23)

नि:शब्द

नि:शब्द --------- अनाब शनाब कुछभी बकते हुए,कहते है, "बोलने की आजादी नही।" क्या खुदको 'निडर' साबित करने के लिए ,कहते है? "डर का माहोल है।'' क्या फितरत है इन लोगों की , वो क्या हमे बेवकूफ समझते है ? या फिर ये लोग यह समजते है की, हम आख मुंडकर विश्वास करते है। जो बोल नही रहे कुछ भी, उनका काम जा कर देखिये। जो काम नही करते उन्हे देखिये, वो बहुत बक बक करते है। आंख मुंदकर मेरी बात सुन लो,"सुन लो ये सरकार गलत है।" सच को छुपाकर झूटको बता कर, असल में यही लोग  आग लगाते है। बोलनाही बिझनेस है जिनका,हम दोनो को खुब समझते है। हम नही खरीदेंगे माल इनका, हमभी खुद की नजर रखते है।