पत्रकारों की भरी परिषद में प्रशासक आए थे l कुल दो विषयों का एजेंडा लेकर आए थे l प्रॉपर्टी और पैसे की बात तो हो गई घंटाभर, पर्यावरण की सेवा की बारी आई तो कह दिया," बस दो मिनट l " उस सेवक को तो कुछ भी नहीं चाहिए था, दो मिनट भी नहीं l प्रशासक ही बोल देते गंभीरता से तो चल जाता बस,दो मिनट! उपक्रम के उद्देश्य की सफलता की चिंता थी, इसलिए सेवक ने सब सह लिया चुपचाप l बिना पगार के समय,खून और पसीना देता था उसका आदर भी नहीं हुआ दो मिनट! ऊपर से यह बताया गया... प्रॉपर्टी पैसों के विषय को ही महत्व दो l उन्होंने भी ऐसा ही किया, दूसरे दिन समाचार पत्रों में दो लाइन भी नहीं दिखी l किसी ने भी जराभी नहीं सोचा,दो मिनट! कवि की गुजारिश है... आप अब तो सोचो दो मिनट l वक्त अगर निकल गया और लाख बार भी दोगे, तो भी काम ना आएंगे दो मिनट l यह एक संकेत भी है, एक संदेश भी है,. अपनेआप के लिए l कितना महत्व है हमें प्रकृति की बात के लिए l जिसका कण कण और क्षण क्षण जीता और मारता है बस हम और आपके लिए l ऐसे कृतघ्न कैसे हो गए हम...