मन की आग दुनिया तक
आज फिर किसी ने अपनी मन की आग से दुनिया जलाने की कोशिश की है l
जान बुज कर की है या अंजाने मे पता नही मगर आग की बारिश की है l
अपनी दुकान चलाने के लिए असला बेचने की कोशिश
की है l
अपने घमंड के लिए सबके घमंड को सुलगाने की कोशिश की है l
लगी आगको बुझाने वाले बहुत कम , जुलसने वाले कई होते है l
कभी कम-ज़रफ़ मतलब,कभी गलतफहमी के शिकार होते
है l
गर्मी तो बीज मे भी होती है, वह अंकुरित हो पेड बनकर फल देती है l
कुदरत की हर ऐसी बात को, जाने क्यू भुलाने की कोशिश होती है l
आओ दीप जलाये पेड लगाये मिट्टी और पानी को जी जान से बचाये l
आज हम सास ले रहे है क्योंकि कई लोगो ने ऐसी हीं कोशिश की है l
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