दो मिनट
पत्रकारों की भरी परिषद में प्रशासक आए थे l
कुल दो विषयों का एजेंडा लेकर आए थे l
प्रॉपर्टी और पैसे की बात तो हो गई घंटाभर,
पर्यावरण की सेवा की बारी आई
तो कह दिया," बस दो मिनट l "
उस सेवक को तो कुछ भी नहीं चाहिए था,
दो मिनट भी नहीं l
प्रशासक ही बोल देते गंभीरता से तो चल जाता
बस,दो मिनट!
उपक्रम के उद्देश्य की सफलता की चिंता थी,
इसलिए सेवक ने सब सह लिया चुपचाप l
बिना पगार के समय,खून और पसीना देता था
उसका आदर भी नहीं हुआ दो मिनट!
ऊपर से यह बताया गया...
प्रॉपर्टी पैसों के विषय को ही महत्व दो l
उन्होंने भी ऐसा ही किया,
दूसरे दिन समाचार पत्रों में
दो लाइन भी नहीं दिखी l
किसी ने भी जराभी नहीं सोचा,दो मिनट!
कवि की गुजारिश है...
आप अब तो सोचो दो मिनट l
वक्त अगर निकल गया और लाख बार भी दोगे,
तो भी काम ना आएंगे दो मिनट l
यह एक संकेत भी है, एक संदेश भी है,.
अपनेआप के लिए l
कितना महत्व है हमें
प्रकृति की बात के लिए l
जिसका कण कण और क्षण क्षण
जीता और मारता है बस
हम और आपके लिए l
ऐसे कृतघ्न कैसे हो गए
हम सोचें दो मिनट, बस... दो मिनट l
प्रॉपर्टी, पैसा, पद,प्रमोशन, पुरस्कार...
यह सब तब तक हैं
जब तक सांसे चल रही है l
हम सब एक ही नाव में बैठे हैं
जो डूबती जा रही है l
हमारी सांसों का भरोसा नहीं,
आज की मस्ती, कल की खुशी
और बच्चों के बारे में सोच रहे हैं l
सही या गलत? सोचो...
दो मिनट, बस!दो मिनट l
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