झूठ की झंजावात मे

झूठ की झंजावात मे सच को बचा कर रखना
तुफान के बीच मे दिये को बचाकर रखना है।

दृग को दिखता है उसको
दृग ललचाता रहता है।
जो दिखाता वह चेतन
असली 'हिरा' होता है।
हिरे को छोड 'पत्थर' पे
सर अपना पटकाता है।
भोग की आंधी मे हमे
'योग' बचाकर रखना है।

कितना खोदोगे जमीन को 
कितनी गंदगी फैलाओगे?
अरे सब है तो हम है!
कब इस बात को समझोगे?
इंद्रियों की लालसा मे 
'आनंद' बचाकर रखना।
विकृत आदतों की बीच मे
'प्रकृती' को बचाकर रखना है

अच्छा कुछ भी सुना न जाता 
सच्चाई मन मान न पाता।
अहंकार और प्रदर्शन में
और कठोरही बनता जाता।
पेड की छाया जैसा होता है साधक
शांत हो जाता जो भी पास है आता।
धर्म की धांदली के बीच
'स्वधर्म' बचाये रखना है।

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