परिवर्तन क्रम

* कविता
( सांगली के जेष्ठ पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ रविंद्र होरा जी के जन्म दिवस पर समर्पित ...
डॉ मनोज पाटिल 13 फरवरी 2024)

जहर के घूंट पीकर जिंदगी बीतती है मगर
अमृत को परोसना सीखा है हमने।
जिन्होंने अमृत पीकर जहर को फैलाया है 
उन्हींके सामने इसे परोसना है हमने।

आयन रैंड, जनरल डायर, मेजर स्कॉट
आज, के दौर में भी देखें हैं हमने।
गोली से उड़ा दे उनको या खुद को जला दे
इस सोच में कई रातें जगी है हमने।

फिर ख्याल हुआ भारत की भारतीयता का
उसीको फिरसे उजागर करना है हमने।
"प्रकृति की रक्षा के लिए शक्तिकी साधना"
अपनी विशेषता को जगाए रखना है हमने।

राजनीति हो या प्रशासन,या हो पत्रकारिता
इन्हे नीचतम स्थिति में देखा है हमने।
अब और नहीं... जिस मिट्टी से आते हैं ये,
उस मिट्टीको सुधारनेका सोचा है हमने।

संवेदनाओं को फिर से जगानेकी प्रयास
बहुत मुश्किल होता हुआ देखा है हमने।
पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए
स्वयं को चुस्त बनाने का सोचा है हमने।

व्यवस्थापरिवर्तन हो सहज !..अपने आप
मानसपरिवर्तनका प्रयास करना है हमने।
मानसपरिवर्तन के बाद व्यवहारपरिवर्तन
परिवर्तन का ऐसाही क्रम चुना है हमने। 

जहर के घूंट पीकर जिंदगी बीतती है मगर
अमृत को परोसना सीखा है हमने।
जिन्होंने अमृत पीकर जहर को फैलाया है 
उन्हींके सामने इसे परोसना है हमने।

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