जानीये और मानीए

कृपया, जानिए और मानिए!

प्रस्तावना:-
    बीस पचीस वर्ष की वैद्यकीय सेवा के बाद नीचे की दो लाइने कहने में मुझे थोड़ा भी संकोच नहीं होता।  "ओल्ड इस गोल्ड" और "स्मॉल इस ब्यूटीफुल"!
      यह दो वाक्य मैं अपनी वैद्यकीय सेवा के संबंध में कह रहा हूं। यह कहते समय मेरा अभिप्राय बिल्कुल ऐसा नहीं है कि ,जो नया है पूरा का पूरा कोयला है और जो कुछ भी बड़ा है वह सारा का सारा अनावश्यक है।
     आज हमारे आसपास बड़े-बड़े अस्पताल बनते दिखाई पड़ रहे हैं। इन बड़े-बड़े अस्पतालों में बड़ी-बड़ी मशीनरी लगी हुई है। वहां पर बड़े-बड़े डॉक्टर आकर  अपनी सेवा दे रहे हैं। वहां पर नौकरी करने वाले हर व्यक्ति को अच्छी पगार भी मिलती होगी। जो मशीनरी और टेक्नोलॉजी वहां पर लगी है ,उसकी मरम्मत मेंटेनेंस भी खूब होती होगी । सब कुछ पैसों के आधार पर ही हो रहा होगा। स्वाभाविकतः यह पैसा मरीजों के इलाज से जो पैसा आता है वहीं से खर्च होता होगा। यहां पर जितना पैसा लगता है, उतना देने की क्षमता हमारे देश में बहुत सारे लोगों में आ गई है, यह हमारे देश के विकास का एक 'परिमाण'हो सकता है। इस परिमाण से देखा जाए, तो हमारे देश बहुत अच्छी तरह विकास कर रहा है, ऐसा हम कह सकते हैं।
     इसके बावजूद कुछ प्रश्न उपस्थित होते हैं,
१.क्या देश के सभी लोगों को यह सुविधा लेने की क्षमता रखते है?
२.क्या देश के सभी लोगों को यह सुविधा देने की क्षमता इस वैद्यकीय व्यवस्था को प्राप्त है?
यदि नहीं...
३.तो इसका इलाज क्या हो सकता है?
   
      हमारी आवश्यकता यह है कि ...
-हर व्यक्ति को जिसकी आवश्यकता है वह इलाज प्राप्त हो।
-वह जहां पर रहता है वहां आसपास में प्राप्त हो।
-वह प्राप्त करने की उसकी क्षमता हो।
-बहुत बड़े-बड़े और कठिन बीमारियां लोगों को हो ही नहीं, वह बड़ी होने से पहले उनका इलाज हो।
-सबसे अच्छा तो यह है कि कोई बीमार ही ना हो।              

किंतु :-
' कोई बीमारी ही ना हो' यह तो संभव नहीं है।
     हम प्रयास करें तो अवश्य बीमारियां कम से कम हो सकती है ,व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा स्वस्थ रह सकता है, वातावरण अधिक से अधिक पवित्र रख सकते हैं। वातावरण को पवित्र रखने के लिए यहां की मिट्टी ,यहां का अन्न, यहां का पानी ,यहां की हवा सब कुछ निर्मल होना चाहिए। हर एक व्यक्ति की जीवनशैली, हमारे व्यक्तिगत तथा सामाजिक व्यवहार, हमारी प्रकृति के संरक्षण के लिए अनुकूल होनी चाहीए। हमे हमारी आवश्यकताए कम से कम रखने का पुरुषार्थ करना चाहिए और कम से कम रखने पर भी हमारा बसर हो जाना चाहिए । हमारी प्राथमिकता 'भोग की सामग्री इकट्ठा करना ' न होकर ,तप की भावना और त्याग की भावना होनी चाहिए। यह सारी चीज हमारे वातावरण का हिस्सा है।
     यदि कोई बीमारी हो भी, तो वह तुरंत पकड़ में आ जाए । उसको तुरंत इलाज मिले। इलाज भी ऐसा हो कि वह करने के बाद कम से कम साइड इफेक्ट्स हो।
... क्या हमें ऐसे विकल्प को नहीं खोजना चाहिए? 
...अगर ऐसा विकल्प हमारे सामने उपस्थित है तो क्या हमें अपनाना नहीं चाहिए?
...ऐसे विकल्प में कोई अपूर्णता है तो क्या उसे पूर्ण करने के प्रयास नहीं करने चाहिए?
      हर कोई आवश्य कहेगा ,जी हां ! हमें ऐसे पर्याय खोजने चाहिए उपलब्ध पर्याय को अपनाना चाहिए और उसमें कोई अपूर्णता है तो उसको पूर्ण बनाने के लिए प्रयास करनी चाहिए।
   
   

हमारे सामने पहले पर्याय यह है कि हम बीमार ही ना पड़े... इसके लिए हमें चार बातों का ख्याल रखना पड़ेगा।
१. हमारा आहार ...
-जो मां ने बनाया हो और मिट्टी से उगा हो।
-हम भूख से कम खाएं, शुद्ध खाए और दिन मैं ही भोजन करें।
- उतना ही खाएं जितना पचा सके, जितना खाया है उसे पचाए। उसके लिए आवश्यक पडने पर व्यायाम करें या लंघन करें।
२. हमारा विहार...
-ऋतु के अनुरुप हो अर्थात ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु ,हेमंत ऋतु में क्या कितना कैसे करना चाहिए वह उतना ही वैसे ही करना चाहिए ।
-अपने स्वयं की प्रकृति के अनुकूल हो ।अर्थात हमारे प्रकृति में वात, पित्त और कफ में से कौन सा कार्यकारी दोष अधिक प्रबल है उसका विचार करके हम सभी कार्य करें।
३. हमारे शरीर की शुद्धि ...
-नियमित रूप से हो।
     प्रतिदिन आवश्यकता के अनुसार मल-मूत्र आदि का विसर्जन इतना ही इसका अर्थ नहीं, अपितु शरद ,हेमंत और वर्षा काल में प्रकोपित हुए पित्त, कफ और वात से अपने शरीर के संशोधित करने का भी अंतर्भाव होता है। इस प्रकोप के पूर्व काल में इन देशों का हमारे शरीर के अंदर संचय ही ना हो इसके लिए भी ध्यान रखना पड़ता है।
४. हमारे अंदर प्रकट होने वाले...
- क्रोध, मान, मायाचार और लोभ को कम करना।
- प्रकट हुए तो उनको व्यवस्थित मैनेज करना ।
- अपने व्यवहार से सामने वाले के मन में भी कषाय प्रकट न हो ऐसा अपना व्यवहार होना चाहिए।
-फिर भी अगर कषायों का सामना करना पड़े तो उसको हैंडल करने का कौशल हमें प्राप्त करना चाहिए।

रोग के प्रमुख कारण:-
  किसी भी चीज का अगर 'आतीयोग' होता है, या 'हिनयोग' होता है या 'मिथ्यायोग' होता है तो रोग निर्माण होते हैं। अतः हमें अतियोग, हीनयोग और मिथ्यायोग से बचना चाहिए। फिर भी हर बार हम यह नहीं कर सकते। तब 'रोग' निर्माण होते हैं। ऐसी स्थिति में ...
-हम अपने आहार विहार से उसको कम कर सकते हैं।  
-लंघन आदि उपक्रम करके शमन कर सकते हैं ।
- घर में और अपने परिसर में जो सामान्य औषधि होती है उसके प्रयोग से उसका सामान कर सकते हैं ।
...परंतु उसके लिए आवश्यक सामान्य ज्ञान हमने सीखा है कि नहीं ?.... यह ज्ञान हमारे दादा दादी नाना नानी के पास भी देखने को मिलेगा। इसे हमें सीखना चाहिए।

वैद्य की उपलब्धता और रोगों की पहचान  :-
     समय पर वैद्य की सलाह लेना यह अत्यंत 'समझदारी' का काम है। उनके सूचना के पालन करना इसमें समझदारी नहीं बल्कि 'प्रमाणिकता एवं समर्पण भाव' की आवश्यकता है।
    हमारे परिसर में ऐसे वैद्य अवश्य हो जो कुशलतापूर्वक व्याधि का निदान कर सके। निदान करने के लिए वैद्य प्रश्न पूछते हैं। स्पर्श करके देखते हैं। नाडी- जिव्हा -शब्द- नेत्र- त्वचा तथा चलने बोलने आदि क्रियो को देखकर भी निदान करते हैं। बहुत से लोगों को यह अनुभव होगा कि आज के समय में भी ऐसे अनेक वैद्य है ।वो रुग्ण के बताने से पहले रोगों को बता देते हैं ।कल क्या खाया ,4 दिन पहले क्या खाया, नींद हुई कि नहीं हुई ...यह सारी चीजे भी बता देते हैं।
     आधुनिक विज्ञान ने रोगों को पहचानने के लिए
रक्त-मल-मूत्र आदि परीक्षा, एक्स-रे , एम. आर. आय, सोनोग्राफी आदि इमेजिंग टेक्निक्स उपलब्ध की है। इन सबोंसे निदान को 'निश्चित' किया जा सकता है। पूर्व में बताए गए वैद्य के कौशल को 'कंफर्म' करने की यह तकनीक उपयुक्त हो सकती है ।लेकिन केवल तकनीक के आधार पर निदान करना और अपनी दृष्टि एवं ज्ञान को भूल जाना यह कदापि उचित नहीं है।
    

इलाज के तरीके :-
   अच्छी तरह निदान करने के बाद रोग की पहचान करने के बाद कौन सा इलाज सबसे योग्य है ? इसका विचार होना चाहिए।  किसी भी पूर्वग्रह अथवा दिखावे की बात सोचे बिना होना चाहिए। किसी के भी अहंकार के बिना होना चाहिए । कई बार अपेंडिक्स का इलाज आयुर्वेद से 2 दिन में भी हो सकता है। बहुत सारी मरीजों में डायबिटीज के लिए जीवन भर औषधी खाने की आवश्यकता नहीं पड़ती...ऐसे और इसके जैसे कई उदाहरण मिलेंगे। आंख खोलकर उन्हें देखना पड़ेगा और हृदय के द्वार खोलकर उन्हें स्वीकारना पड़ेगा।
    आजकल की दुनिया में जब 'पैसा'ही महत्वपूर्ण हो गया है। तो पैसा कमाने के लिए 'हथकंडे' अपनाए जा सकते हैं। डॉक्टर हो ,फार्मास्यूटिकल कंपनी हो या डायग्नोस्टिक इंडस्ट्री हो ...पैसे को प्रधानता दिए बिना 'सेवा करें' तो जीवन में अधिक सफलता,सुख, शांति और सुलभता प्राप्त कर सकते हैं।
 
विशेष परिस्थितियों मे:-
     जहां पर शल्य चिकित्सा अनिवार्य हो जाती है वहां करने का विधान ग्रंथ में भी आता है। परंतु केवल एक ही ग्रंथ अथवा एक ही गुरु को प्रमाण मानना, अन्य पद्धति ,अन्य ग्रंथ, अन्य गुरुओं का अपमान करना या नहीं मानना ,या फिर किसी 'प्रोटोकॉल' को चिपके रहना रुग्ण के लिए, नए अनुसंधान के लिए तथा चिकित्सा जैसे पुण्य कार्य के लिए बाधक होता है। अपने अनुभव ,अपनी विचारशक्ति, अपनी आकलनशक्ति , सभी प्रकार के अध्ययन के बाद यदि हम सेवा में समर्पित हो जाए तो अत्यंत आसानी से कई रोगों को तुरंत , कम संसाधनों के साथ , रुग्ण जहां रहता है वहींपर ठीक कर सकते है।

समाज की जिम्मेदारी:-
      ऐसे सेवा में समर्पित वैद्य अपने आसपास समाज में रहे ,इसके जिम्मेदारी समाज पर भी है। समाज अगर 'कृतज्ञ' है ,समाज अगर 'विनम्र' है तो सेवा का भाव बढ़ेगा। नहीं तो 'व्यापार' ही बढ़ेगा । व्यक्ति में चारित्र्य की कमी होती जाएगी तो कानून बनेंगे। कानून के लिए प्रोटोकॉल बनेंगे। प्रोटोकॉल के लिए रुग्ण को मरना भी पड सकता है... इसके भी उदाहरण सभी ने कहीं ना कहीं देखे होंगे। याद करेंगे तो, कोरोना के दिन याद करो, याद आ जाएंगे।
  
औषधि:-
     कोई औषधि साइड इफेक्ट के बिना हो नहीं सकती। औषधि जितनी तीव्र गुणकारी होगी,उतनी ही अधिक अवगुणकारी हो सकती है। उनका उपयोग कब करना ,कितना करना और कैसे करना इसके संबंध में बहुत सावधानी बरतनी आवश्यक होती है। कम साइड इफेक्ट वाली, शीघ्र गुणकारी औषधि भी हो सकती है। वैसे पर्याय उपलब्ध है। क्या हम उसे मानने के लिए तैयार हैं? (ऐसा बार-बार पूछना पड़ता है।) ऐसी औषधि आयुर्वेद और नेचुरोपैथी के रूप में उपलब्ध है। उसके बारे में जो 'पूर्वग्रह' फैलाए गए हैं ,उन्हें हम दूर करने के लिए तैयार हैं? इनके विवेचन में या उपयोग में कोई कमियां हो सकती है, उसमें टेस्ट /रिसर्च / सर्वे आदि करने के लिए हम समय और ऊर्जा दे पा रहे हैं?.... पर्याप्त मात्रा में देने की आवश्यकता है। तभी हम उसकी क्षमता का फायदा उठा सकते हैं। "कुछ कमियां है, इसलिए सर्वथा त्याज्य है।", ऐसा तो नहीं हो सकता। औषधि कड़वी है, औषधीय को घर में ही प्रक्रिया से बनाना पड़ती है, वह लेने अथवा करने के लिए असुविधाजनक हैं, ऐसी क्षुद्र बातोंको हम सोचेंगे तो हम 'तप' कैसे कर पाएंगे? 'प्राणी संयम' और ' इंद्रिय संयम' की हम बात करते हैं। क्या संयम व्यवहार में नहीं आएगा?

कंज्यूमैरिज्म :-
   कई बार हम जो उपयोग करते हैं, हम जो कंज्यूम करते हैं ,वह करने के लिए हमें हमारी अपनी परंपरा- -विद्या -सिद्धांत आदि से भटकाया गया है। नई चीजों का अंगीकार करने के लिए उकसाया गया है। उसके लिए डराया गया है, ठगा गया है। हमें हमारी दादी और नानी की अच्छी चीजों को भुलाया गया है। यह जो कंज्यूमैरिज्म है, यह जो मार्केटिंग टेक्निक्स है, यह जो ग्रोथ और डेवलपमेंट का ग्राफ है, यह जो प्रोफेशनलिज्म है... ऐसे शब्दों के नाम पर हमें भ्रमित किया गया है । यह सारी की सारी चीजे मानवता से और अपनी मूल्यव्यवस्था से हमें दूर ले जाती है।



"स्मॉल इस ब्यूटीफुल" और "ओल्ड इस गोल्ड!"

     हर घर में काम से कम एक ऐसी व्यक्ति हो जो आरोग्य और योग के सिद्धांतों को समझने वाली है। हर एक घर में नही तो कम से कम चार-पांच घरों में ,पांच-दस घरों में से किसी एक घर में तो ऐसी व्यक्ति होनी चाहिए ।हर घर में प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति पर ,इन सिद्धांतों पर भरोसा होना चाहिए । हर गांव में, या कॉलोनी में एक ऐसा वैद्य हो, जो नाडीसे रोगों की पहचान कर सकेगा। हर कस्बे में/ 10000 लोकसंख्या के बीच प्राकृतिक चिकित्सा की सुविधा देने की व्यवस्था हो। आज सरकारी प्राथमिक सुविधा केंद्र तो बने हैं, किंतु इस केंद्र में 'सुविधा'नहीं मिलती । सुविधा है भी तो, लोगों को उसे पर 'भरोसा' नहीं है। 'भरोसा'  निर्माण हो ऐसा सबका 'चारित्र्य' बनना आवश्यक है। ऐसे चरित्र बने इसके लिए उसे दूसरे वाक्य को मानना पड़ेगा... "ओल्ड इस गोल्ड"!
   हर 50 किलोमीटर में/तहसील में वैद्य , व्यवस्थापक, समुपदेशन करने वाले, योग सिखाने वाले एवं परिचारकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। यहां अत्ययिक चिकित्सा की व्यवस्था भी होनी चाहिए। गांव में इलाज ना हो पाए तो, वह इलाज यहांपर मिल जाने चाहिए। परंतु इसकी आवश्यकता काम ही पड़े ऐसी स्थिति गांव में ,कॉलोनी में होनी चाहिए।
   क्लिस्ट/ कॉम्प्लिकेटेड व्याधियों को ठीक करने के लिए सभी प्रकार की सुविधा हर एक लाख व्यक्तियों की संख्या के लिए पर्याप्त हो सकते हैं। किंतु वह 50 किलोमीटर के अंदर / एक लाख की लोक संख्या के लिए मिल जानी चाहिए। वहां पर 'प्रोटोकॉल' नहीं 'मानवता' दिखनी चाहिए। वहां पर व्याधि ग्रस्त व्यक्ति के साथ साथ ,उनकी किसी परिवारजन के रहने खाने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। वहां पर काम करनेवाले अतिविशिष्ट/ सुपरस्पेशलिस्ट चिकित्सकों के सम्मेलन- संशोधन -शिक्षा- प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था हर जिले में होनी चाहिए। ऐसी व्यवस्था अगर हम बना पाए तो कह सकते हैं कि हम चिकित्सा क्षेत्र में एक व्यवस्थित सुविधा देने वाले समाज हैं। अन्यथा जो है वह तो है ही!
   आजकल 'ऑर्गेनिक' के नाम पर हम बहुत सारे पैसे खर्च करने के लिए तैयार हैं। किंतु हम यह मानने के लिए तैयार नहीं है की यह तो हमारी मिट्टी के उपज है ।
यह तो हमारे गार्डन के फूल और पत्ते हैं। हमारे गली के पौधे हैं ।हमारे गौ माता की दूध और घी से बने हैं ।हम तो अपनी मिट्टी से दूर हो गए। उसके गुणधर्म भी कल्पनातीत है। क्या हम उसे जानने के लिए तैयार है और मानने के लिए तैयार हैं? फिर से उसे मिट्टी के और उसे माता के पास जाने के लिए तैयार हैं?
     जब हमें एहसास होगा कि हम 'चक्रव्यूह' में फहते चले जा रहे हैं। तब हम निर्णय करेंगे कि इस चक्रव्यूह से निकलना है। हमारे पास 'पर्याय' उपलब्ध हैं। आजकल भारतीय संस्कृतिपर इतराने का समय आ गया है। सारी दुनिया प्रशंसा करें ऐसी स्थिति हम पैदा कर सकते हैं। केवल प्रशंसा ही नहीं, अनुपालन के लिए भी तत्पर हो सकती है । इसके लिए हमें हमारी अपनी सिद्धांतों की ओर देखना पड़ेगा। हमारे सिद्धांतों की जितनी जड़े मजबूत होगी, पेड़ उतना ही बड़ा होगा। पेड़ जितना बड़ा होगा, उतने ही पत्ते, फूल और फल मिलेंगे। छाया प्राप्त होगी। तभी ज्यादा से ज्यादा जीवन को सुरक्षा मिलेगी। ज्यादा से ज्यादा जीवों का कल्याण होगा। उसके लिए हमें ही तत्पर होना पड़ेगा। हर एक सात्विक व्यक्ति एक 'जानदार' पेड़ बने, 'फलदार' पेड़ बने, 'छायादार' पेड़ बने और ज्यादा से ज्यादा व्यक्ति सात्विक बने तो 'कल्पवृक्ष' की क्या आवश्यकता है? हमें ऐसे ऐसे 'व्यक्तियों के निर्माण' में ध्यान देना पड़ेगा।
   इन सारी बातों को देखकर ऐसा लग सकता है कि यह कैसे संभव है? यह तो सारी आदर्श बातें हैं । प्रैक्टिकल संभव नहीं है।
...इसका पहला कदम यह है कि हम मान ले कि यह "संभव है।"
शुभम भवतु! कल्याण मस्तु!
    
-  वैद्य मनोज पाटील, सांगली.( महाराष्ट्र)
मो :- 9890979282 ( दिनांक 30 सितंबर 2023)

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