शायरी

दो शेर अर्ज है ,दोस्तों ..
( "इरशाद" )

इबादत तो दिल से होती है ना, दिमाग की जरूरत है क्या?
पर इबादत से दिमाग की मरम्मत जरूर होती है।

नफरत पनपे अगर दिमाग में ,तो इबादत की जरूरत क्या?
अगर अदब की आदत बने तो इबादत मुकम्मल होती है।

मोहब्बतको वक्त नहीं मिलता, शिकायत में जाया करते हैं ...
जो सरफरोश है वो तो बस गुरबत के लिए जिया करते हैं।

इबादत करते हैं कि नहीं करते है, यह  हम उनसे पूछे क्यों?
जो गुलिस्ता बनाने की चाहत में सदा मदमस्त हुए फिरते हैं।

वैद्य मनोज पाटिल
२/९/२०२३

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