आरावली

आरावली
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सोने की मिट्टी
फूल जैसे पहाड़
लोगों की बातें और दिल
गुड का शरबत!!

छोटी छोटी टेंकडीया
जैसे गुलाब की पंखुड़ियां,
खो जाये मुसाफिर ऐसी
पेड़ों  की अंगड़ाइयां।

मुसाफिर मन फस रहा था
बरबस मोह के जाल में ,
हवायें रोक रही थी मगर
बुद्धी लगी थी निकलने में।

निकलने की कोशिश में 
मुसाफिर के पसीने छूट रहे थे,
जैसे जैसे पिघलते रहे
वैसे वैसे वे महक रहे थे।

फूलों के साथ रहकर
फूलों जैसे बनते गए।
यह फूल,फुल नहीं 
पहाड़ी है यह याद रहे।

हल्दीघाटी का शेर
घूमा होगा यहीं कहीं
उसकी यादें, उसके हौसले
जिंदा है अभी, मरे नहीं ।
जिंदा है अभी, मरे नहीं।।

- डॉ मनोज पाटील
२५/१२/२१

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