रेखता (समर्पण)

रेखता (समर्पण)
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अपनी बदनसीबी पर इतना
यकीन हुआ है आजकल 
कि ना कोई सपने बुनते हैं 
ना कोई ख्वाइश सजती है |

एक जिम्मेदारी का एहसास है
और कुछ जज्बात जरूर है |
मौत का भी ना डर है न इंतजार है
सिर्फ “जिंदगी” की बात है |

चंद दोस्त है और
कुछ रंग बिरंगी यादें हैं |
पर ना किसी से उम्मीद है
ना किसी से शिकायत है |

किसी को कुछ ''सलाहे" दी थी...
तुरंत भूलने की कोशिश भी की थी |
वह "भूलना" मुकम्मल हो
बस इतनी सी ख्वाहिश है |

कुछ अपनी मां,कुछ भारत मां
और धरती मां की फिक्र हैं |
निजाद का कोई खाका तो नहीं 
एक सादा कोशिश है,रेखता जरूर है |

{खाका= योजना, रेखता= समर्पण}

डा मनोज पाटिल
12 दिसंबर 2021

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