वफा

वफा
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वफादारी की कोई कीमत ही नही
"बेवफाई" करने को दिल करता है ।

"चालाक" लोग जानते हैं हमारी फितरत को 
थोड़ा उन्हें चौंका दें ,ऐसा दिल करता है ।

कब तक सहते रहे वफादारी का ' मजाक'
यूं भर दे अपने जख्मोंको दिल करता है ।

रूह से यह सुना ना गया और आवाज आई...
तू कर ना सकेगा ,यह जो तेरा "दिल" करता है ।

तू अपने जख्मों को छोड़ ,औरों के जख्म भरता जा
तेरी जिंदगी का यही फलसफा ,खुद को "खुद"
 बनाता जा।

पलभर की रोशनी के लिए घर नहीं जलाता कोई
अपने घर की कर दे सफाई और आराम से सो जा ।

तुम “ तुम ”ना रहो तो क्या रह गया?
तुम्हारे मौत पर मातम करेगा कौन ?

जो कर नहीं सकता ,वह क्यों है सोचता?
वफा तु "अपने आप" से क्यों नहीं करता?

 - मनोज पाटिल
( दिनांक 9.11.21)

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