पेड(गजल)
गजल
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कहते रहते हैं ,पेड़ कितना कुछ
जैसे पेड़ नहीं, हो किताब कोई
एहसान फरामोश इंसान जैसा
सारी दुनिया में कोई भी नहीं ।
हालत जमीन की,आबोहवा की
हुई बदतर कैसे? क्या जानता नहीं कोई?
अपने ही पैर पर मारता कुल्हाड़ी
जानता है मानता है पर,क्या संभलता है कोई?
गुलिस्ता दुनिया का, दास्तां दिलों की
पेड़ोंसे ही दरबदर नजर आती है मगर
सिकुड़ते पत्तों के दर्द भरे अल्फाज
क्या सुनता है कोई ,क्या समझता है कोई?
बचाने वालों का हो खैर मकदम
वरना दुनिया की कोई खैर नहीं
जो मान ले किताब इन दरख्तों को
उन जैसा समझदार कोई भी नहीं ।
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